श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  7.127.26-27 
गच्छ गच्छेति गुरुणा सोऽनुज्ञातो वृकोदर:।
तत: पाण्डुसुतो राजन् भीमसेन: प्रतापवान्॥ २६॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राण: प्रगृहीतशरासन:।
ज्येष्ठेन प्रहितो भ्रात्रा भ्राता भ्रातु: प्रियंकर:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
राजन ! इस प्रकार 'जाओ, जाओ' कहकर अपने बड़े भाई की आज्ञा से पेट में वृक नामक अग्नि धारण करने वाले महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेन ने छिपकली की खाल के दस्ताने पहने और हाथ में धनुष लेकर वहाँ से जाने को तैयार हो गए। वे भाई-प्रेमी थे और बड़े भाई के भेजने पर ही वहाँ से जाने को तैयार हुए थे॥ 26-27॥
 
King! Thus, saying 'Go, go', on the orders of his elder brother, the mighty son of Pandu, Bhimasena, who carried a fire called Vrik in his stomach, put on gloves made of monitor lizard's skin and took a bow in his hand and got ready to leave from there. He was a brother who loved his brother and had prepared to leave from there only because his elder brother had sent him.॥ 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)