श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 124: कौरव-पाण्डव-सेनाका घोर युद्ध तथा पाण्डवोंके साथ दुर्योधनका संग्राम  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.124.5 
अश्रद्धेयमचिन्त्यं च कर्म तस्य महात्मन:।
वृष्ण्यन्धकप्रवीरस्य श्रुत्वा मे व्यथितं मन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वृष्णि और अंधक कुल के महारथी सात्यकि का कार्य अकल्पनीय (संभावना से परे) है। इस पर सहज विश्वास नहीं होता। इसे सुनकर मेरा हृदय व्यथित हो रहा है।॥5॥
 
The act of Satyaki, the great warrior of the Vrishni and Andhaka clans, is unthinkable (beyond possibility). It cannot be believed easily. My heart is distressed on hearing it. ॥5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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