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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 123: सात्यकिका घोर युद्ध और दु:शासनकी पराजय  »  श्लोक 16-18h
 
 
श्लोक  7.123.16-18h 
नागैश्च बहुधा च्छिन्नैर्ध्वजैश्चैव विशाम्पते॥ १६॥
हयैश्च कनकापीडै: पतितैस्तत्र मेदिनी।
शैनेयशरसंकृत्तै: शोणितौघपरिप्लुतै:॥ १७॥
अशोभत महाराज किंशुकैरिव पुष्पितै:।
 
 
अनुवाद
महाराज! हे प्रजा की रक्षा करने वाले राजा! उस समय पृथ्वी, जो गिरे हुए हाथियों, अनेक टुकड़ों में कटी हुई ध्वजाओं, तथा भूमि पर पड़े हुए स्वर्ण शिखाओं से सुशोभित घोड़ों से आच्छादित थी, जो सात्यकि के बाणों से घायल होकर रक्त से भीगी हुई थी, ऐसी शोभा पा रही थी, मानो वह लाल पुष्पों से युक्त पलाश वृक्षों से आच्छादित हो।
 
Maharaj! O King who protects his subjects! At that time the earth, covered with fallen elephants, flags cut into many pieces, and horses adorned with golden crests lying on the ground, which were wounded by Satyaki's arrows and were soaked in blood, looked as beautiful as if it were covered with Palaash trees filled with red flowers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)