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mahabharat 7.122.65: जिस प्रकार तीनों लोकों का राज्य पाने की इच्छा रखने वाले इन्द्र और प्रह्लाद में युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उस समय द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्न में भी अद्भुत युद्ध आरम्भ हो गया।   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.122.65 
तदद्भुतमभूद् युद्धं द्रोणपाञ्चालयोस्तदा।
त्रैलोक्यकाङ्क्षिणोरासीच्छक्रप्रह्लादयोरिव॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार तीनों लोकों का राज्य पाने की इच्छा रखने वाले इन्द्र और प्रह्लाद में युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उस समय द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्न में भी अद्भुत युद्ध आरम्भ हो गया।
 
Just as there was a war between Indra and Prahlada who desired the kingdom of the three worlds, similarly at that time a wonderful war started between Dronacharya and Dhrishtadyumna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)