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mahabharat 7.122.55: महाराज! तत्पश्चात् क्रोध से अचेत हुए धृष्टद्युम्न ने मुड़ी हुई गांठों वाले नब्बे बाणों से द्रोणाचार्य की छाती पर प्रहार किया।   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  7.122.55 
ततो द्रोणं महाराज पाञ्चाल्य: क्रोधमूर्च्छित:।
आजघानोरसि क्रुद्धो नवत्या नतपर्वणाम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तत्पश्चात् क्रोध से अचेत हुए धृष्टद्युम्न ने मुड़ी हुई गांठों वाले नब्बे बाणों से द्रोणाचार्य की छाती पर प्रहार किया।
 
Maharaj! Thereafter Dhrishtadyumna, unconscious with anger, attacked Dronacharya's chest with ninety arrows having bent knots. 55.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)