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mahabharat 7.122.53: महाराज! जब युद्धस्थल में धृष्टद्युम्न के बाणों से द्रोणाचार्य की गति बाधित हुई, तब (कौरव सेना में) सहसा हाहाकार मच गया।   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  7.122.53 
ततो हाहेति सहसा नाद: समभवन्नृप।
पाञ्चाल्येन रणे दृष्ट्वा द्रोणमावारितं शरै:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जब युद्धस्थल में धृष्टद्युम्न के बाणों से द्रोणाचार्य की गति बाधित हुई, तब (कौरव सेना में) सहसा हाहाकार मच गया।
 
King! When Dronacharya's progress was obstructed by Dhrishtadyumna's arrows in the battlefield, there was suddenly an uproar (in the Kaurava army).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)