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mahabharat 7.122.46-47h: तब द्रोणाचार्य ने उन पर बाणों का जाल फैला दिया। हे राजनश्रेष्ठ! द्रोणाचार्य के कान उखाड़कर छोड़े गए बाणों से घायल होकर उन राजकुमारों को यह भी नहीं सूझा कि अब क्या करें॥46 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  7.122.46-47h 
तत: शरमयं जालं द्रोणस्तेषामवासृजत्।
ते हन्यमाना द्रोणस्य शरैराकर्णचोदितै:॥ ४६॥
कर्तव्यं नाभ्यजानन् वै कुमारा राजसत्तम।
 
 
अनुवाद
तब द्रोणाचार्य ने उन पर बाणों का जाल फैला दिया। हे राजनश्रेष्ठ! द्रोणाचार्य के कान उखाड़कर छोड़े गए बाणों से घायल होकर उन राजकुमारों को यह भी नहीं सूझा कि अब क्या करें॥46 1/2॥
 
Then Dronacharya spread a net of arrows over them. O best of kings! Wounded by the arrows shot by Dronacharya after pulling out his ears, those princes did not even know what they should do.॥ 46 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)