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mahabharat 7.122.41: तदनन्तर वह पांचाल कुल को आनन्द देने वाला राजकुमार तुरन्त ही रथ से नीचे गिर पड़ा, जैसे वायु के आघात से पर्वत शिखर से विशाल चम्पा का वृक्ष गिर जाता है ॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  7.122.41 
ततोऽपतद् रथात् तूर्णं पाञ्चालकुलनन्दन:।
पर्वताग्रादिव महांश्चम्पको वायुपीडित:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर वह पांचाल कुल को आनन्द देने वाला राजकुमार तुरन्त ही रथ से नीचे गिर पड़ा, जैसे वायु के आघात से पर्वत शिखर से विशाल चम्पा का वृक्ष गिर जाता है ॥ 41॥
 
Then that prince who brought joy to the Panchala clan, instantly fell down from the chariot like a huge Champa tree falling from a mountain peak after being struck by the wind. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)