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mahabharat 7.122.38: नरेश्वर! द्रोणाचार्य ने अपने बाणों द्वारा उन समस्त अस्त्र-शस्त्रों को सब ओर से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और आकाश में महान् मेघों के मेघों को छिन्न-भिन्न करके बहने वाले वायुदेव के समान शोभायमान हो रहे थे॥38॥   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  7.122.38 
निहत्य तान् बाणगणैर्द्रोणो राजन् समन्तत:।
महाजलधरान् व्योम्नि मातरिश्वेव चाबभौ॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! द्रोणाचार्य ने अपने बाणों द्वारा उन समस्त अस्त्र-शस्त्रों को सब ओर से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और आकाश में महान् मेघों के मेघों को छिन्न-भिन्न करके बहने वाले वायुदेव के समान शोभायमान हो रहे थे॥38॥
 
Nareshwar! Dronacharya, with his arrows, broke all those weapons into pieces from all sides and was looking beautiful like the Vayudev flowing after disintegrating the clouds of the great clouds in the sky. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)