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mahabharat 7.122.35: महाराज! उस युद्ध में मैंने यह आश्चर्यजनक बात देखी कि द्रोणाचार्य उस तेजस्वी पांचाल राजकुमार वीरकेतु की ओर आगे नहीं बढ़ सके।   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  7.122.35 
तत्राद्भुतं महाराज दृष्टवानस्मि संयुगे।
यद् द्रोणो रभसं युद्धे पाञ्चाल्यं नाभ्यवर्तत॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस युद्ध में मैंने यह आश्चर्यजनक बात देखी कि द्रोणाचार्य उस तेजस्वी पांचाल राजकुमार वीरकेतु की ओर आगे नहीं बढ़ सके।
 
Maharaj! In that war I saw the amazing thing that Dronacharya could not advance towards that dashing Panchala prince Veerketu.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)