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mahabharat 7.122.26-27: भरतनन्दन! अब तुम शीघ्रता से उस स्थान पर जाओ जहाँ सात्यकि इस रथ पर खड़े हैं। यदि तुम वहाँ न रहो, तो यह सारी सेना भाग जाएगी। अपने हित के लिए तुम्हें युद्धस्थल में वीर सात्यकि के साथ युद्ध करना चाहिए।॥ 26-27॥   |   mahabharat अध्याय 7.122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  7.122.26-27 
गच्छ तूर्णं रथेनैव यत्र तिष्ठति सात्यकि:॥ २६॥
त्वया हीनं बलं ह्येतद् विद्रविष्यति भारत।
आत्मार्थं योधय रणे सात्यकिं सत्यविक्रमम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! अब तुम शीघ्रता से उस स्थान पर जाओ जहाँ सात्यकि इस रथ पर खड़े हैं। यदि तुम वहाँ न रहो, तो यह सारी सेना भाग जाएगी। अपने हित के लिए तुम्हें युद्धस्थल में वीर सात्यकि के साथ युद्ध करना चाहिए।॥ 26-27॥
 
Bharatanandan! Now you quickly go to the place where Satyaki is standing in this chariot. If you are not there, this entire army will run away. For your own benefit, you should fight with the brave Satyaki in the battlefield.'॥ 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)