श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 122: द्रोणाचार्यका दु:शासनको फटकारना और द्रोणाचार्यके द्वारा वीरकेतु आदि पांचालोंका वध एवं उनका धृष्टद्युम्नके साथ घोर युद्ध, द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना, धृष्टद्युम्नका पलायन, आचार्यकी विजय  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  7.122.18-19h 
यावत् फाल्गुननाराचा निर्मुक्तोरगसंनिभा:॥ १८॥
नाविशन्ति शरीरं ते तावत् संशाम्य पाण्डवै:।
 
 
अनुवाद
जब तक अर्जुन के बाण तुम्हारे शरीर में ऐसे प्रवेश न कर रहे हों, जैसे सर्प अपनी केंचुली उतार देते हैं, तब तक तुम्हें पाण्डवों के साथ संधि कर लेनी चाहिए॥18 1/2॥
 
As long as Arjuna's arrows are not penetrating your body, like serpents shedding their sloughed skin, you should enter into a treaty with the Pandavas.॥ 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)