तं शरानाददानं च रक्षमाणं च सारथिम्।
आत्मानं पालयानं च तावका: समपूजयन्॥ ४७॥
अनुवाद
सात्यकि ने बाण धारण करते हुए अपनी तथा अपने सारथि की रक्षा की। आपके सैनिकों ने भी उसके इस कार्य की बहुत प्रशंसा की। 47.
Satyaki, while receiving the arrows, protected himself as well as his charioteer. Your soldiers also praised his act highly. 47.
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे दुर्योधनपलायने विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका शत्रुसेनामें प्रवेश और दुर्योधनका पलायनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२०॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/२ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)