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mahabharat 7.117.9: राजन! जैसे बहुत से क्रोधित सर्प बिल से निकल आते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य के रथ से शरीर को छेदते हुए बाण निकलकर उनके चारों ओर गिरने लगे।   |   mahabharat अध्याय 7.117: सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 117: सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  7.117.9 
समुत्पतन्ति वल्मीकाद् यथा क्रुद्धा महोरगा:।
तथा द्रोणरथाद् राजन्नापतन्ति तनुच्छिद:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
राजन! जैसे बहुत से क्रोधित सर्प बिल से निकल आते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य के रथ से शरीर को छेदते हुए बाण निकलकर उनके चारों ओर गिरने लगे।
 
King! Just as a number of angry serpents emerge from a hole, similarly, arrows piercing the body emerged from Dronacharya's chariot and began falling all around him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)