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mahabharat 7.117.3: उस समय द्रोणाचार्य ने तीन लोहे के बाण चलाये, जो विचित्र और विषैले सर्पों के समान थे, और शिनि के पौत्र सात्यकि के माथे में गम्भीर रूप से छेद कर दिये।   |   mahabharat अध्याय 7.117: सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 117: सात्यकि और द्रोणाचार्यका युद्ध, द्रोणकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.117.3 
ततो द्रोण: शिने: पौत्रं चित्रै: सर्वायसै: शरै:।
त्रिभिराशीविषाकारैर्ललाटे समविध्यत॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उस समय द्रोणाचार्य ने तीन लोहे के बाण चलाये, जो विचित्र और विषैले सर्पों के समान थे, और शिनि के पौत्र सात्यकि के माथे में गम्भीर रूप से छेद कर दिये।
 
At that time Dronacharya struck three arrows made entirely of iron, which looked like strange and poisonous serpents, deeply piercing the forehead of Satyaki, the grandson of Shini.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)