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श्लोक  7.117.28 
निर्विद्धस्तु शरैर्घोरैरक्रुद्धॺत् सात्यकिर्भृशम्।
सायकान् व्यसृजच्चापि वीरो रुक्मरथं प्रति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
उन भयंकर बाणों से घायल होकर वीर सात्यकि अत्यन्त क्रोधित हो उठे और उन्होंने स्वर्णमय रथधारी द्रोणाचार्य पर बाणों की वर्षा कर दी।
 
Being wounded by those dreadful arrows, the valiant Satyaki became very angry. He showered a volley of arrows on Dronacharya who had a golden chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)