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mahabharat 7.116.38-39h: तब सात्यकि ने अपने धनुष पर स्वर्ण पंख वाला एक अत्यंत तेजस्वी बाण चढ़ाया, जो क्रोधित सर्प के समान दिखाई देता था। उसने वह बाण कृतवर्मा पर चलाया।   |   mahabharat अध्याय 7.116: सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुन: पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 116: सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुन: पराजय  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  7.116.38-39h 
सुवर्णपुङ्खं विशिखं समाधाय च सात्यकि:॥ ३८॥
व्यसृजत् तं महाज्वालं संक्रुद्धमिव पन्नगम्।
 
 
अनुवाद
तब सात्यकि ने अपने धनुष पर स्वर्ण पंख वाला एक अत्यंत तेजस्वी बाण चढ़ाया, जो क्रोधित सर्प के समान दिखाई देता था। उसने वह बाण कृतवर्मा पर चलाया।
 
Now Satyaki fixed a very brilliant arrow with golden feathers on his bow, which looked like an angry serpent. He shot that arrow at Kritavarma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)