श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 115: सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध  »  श्लोक d1-d2
 
 
श्लोक  7.115.d1-d2 
(न चाजित्वा रणे ह्येतान् शक्य: प्राप्तुं जयद्रथ:।
नापि पार्थो मया सूत शक्य: प्राप्तुं कथंचन॥
एते तिष्ठन्ति सहिता: सर्वविद्यासु निष्ठिता:॥)
 
 
अनुवाद
सूत! इन्हें युद्ध में परास्त किये बिना मैं न तो जयद्रथ को प्राप्त कर सकता हूँ और न ही अर्जुन को किसी प्रकार प्राप्त कर सकता हूँ। ये समस्त विषयों में निपुण योद्धा संगठित होकर एक साथ खड़े हैं।
 
Suta! Without defeating them in the battle, neither can I get Jayadratha nor can I get Arjuna in any way. These warriors proficient in all the subjects are standing together in an organized manner.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)