श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 115: सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  7.115.44-45h 
स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे॥ ४४॥
अभ्यगाद् धरणीं घोर: श्वसन्निव महोरग:।
 
 
अनुवाद
वह भयंकर तोमर महाफुंफकारते हुए सर्प के समान उस महासमर में सात्यकि की बायीं भुजा को छेदकर पृथ्वी में अन्तर्धान हो गया।
 
That fearsome Tomara, like a great hissing serpent, pierced Satyaki's left arm in that great battle and disappeared into the earth. 44 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)