श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 115: सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  7.115.15-16 
यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यत:।
सुमहत् कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम्॥ १५॥
एते हि बहव: सूत दुर्निवाराश्च संयुगे।
दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविता:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सूत! द्रोणाचार्य की सेना के बाईं ओर मेघ के समान दिखने वाली इस विशाल गज सेना के मुख पर रुक्मरथ खड़ा है। इसमें ऐसे अनेक वीर योद्धा हैं, जिन्हें युद्ध में रोकना अत्यन्त कठिन है। दुर्योधन की आज्ञा से वे प्राणों का मोह त्यागकर मुझसे युद्ध करने के लिए खड़े हैं।॥ 15-16॥
 
‘Suta! Rukmaratha is standing at the mouth of this huge elephant army which looks like a cloud on the left side of Dronacharya's army. There are many such brave warriors in it, who are very difficult to stop in the war. On the orders of Duryodhan, they have given up their attachment to life and are standing to fight with me.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)