श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.114.5 
आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते।
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वे चढ़ने, उतरने, फैलने, उछलकर चलने, अच्छी तरह आक्रमण करने, युद्ध करने तथा अवसर पाकर भागने में भी कुशल हैं ॥5॥
 
They are skilled in climbing, descending, spreading out, moving by jumping, attacking well, going to war and also in fleeing when they find an opportunity. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)