श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.114.16-17 
गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे।
संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम्॥ १६॥
तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि।
सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय॥ १७॥
 
 
अनुवाद
संजय! इस प्रकार जब पाण्डवों में श्रेष्ठ, ज्ञानी और सात्वतवंशी दानवीर महारथी अर्जुन मेरी सेनारूपी समुद्र को भेदकर एक ही सारथी की सहायता से उसमें प्रवेश कर गए, तब मुझे अपनी सेना के बचने की कोई आशा नहीं दिखती। 16-17॥
 
Sanjay! Thus, when Arjuna, the best of the Pandavas, well-versed, and the generous charioteer Yuyudhan of the Satvat dynasty, having swiftly penetrated the ocean of my army, entered into it with the help of a single charioteer, then I do not see any hope of my army remaining. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)