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mahabharat 7.113.32-34h: सात्यकि बोले - हे ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं धर्मराज की आज्ञा से धनंजय के मार्ग पर जा रहा हूँ। कृपया कुछ ऐसा कीजिए जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्य सदैव अपने गुरु के मार्ग का अनुसरण करते आए हैं। अतः जैसे मेरे गुरु गए हैं, वैसे ही मैं भी शीघ्र ही जाऊँगा। 32-33 1/2।   |   mahabharat अध्याय 7.113: सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 113: सात्यकिका द्रोण और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए काम्बोजोंकी सेनाके पास पहुँचना  »  श्लोक 32-34h
 
 
श्लोक  7.113.32-34h 
सात्यकिरुवाच
धनंजयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात्॥ ३२॥
गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन् न मे कालात्ययो भवेत्।
आचार्यानुगतो मार्ग: शिष्यैरन्वास्यते सदा॥ ३३॥
तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गत:।
 
 
अनुवाद
सात्यकि बोले - हे ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं धर्मराज की आज्ञा से धनंजय के मार्ग पर जा रहा हूँ। कृपया कुछ ऐसा कीजिए जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्य सदैव अपने गुरु के मार्ग का अनुसरण करते आए हैं। अतः जैसे मेरे गुरु गए हैं, वैसे ही मैं भी शीघ्र ही जाऊँगा। 32-33 1/2।
 
Satyaki said - O Brahman! May you be blessed. I am going on the path of Dhananjaya by the order of Dharmaraj. Please do something so that I do not get delayed. Disciples have always followed the path of their teacher. Therefore, just as my teacher has gone, I will also go soon. 32-33 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)