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mahabharat 7.111.5: ‘महाराज! अर्जुन के लिए मुझे अपने प्राणों की रक्षा की किसी भी प्रकार चिंता नहीं है; फिर आपकी आज्ञा पाकर मैं इस महायुद्ध में क्या नहीं कर सकता?॥5॥   |   mahabharat अध्याय 7.111: सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 111: सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.111.5 
न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्या: कथंचन।
त्वत्प्रयुक्त: पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! अर्जुन के लिए मुझे अपने प्राणों की रक्षा की किसी भी प्रकार चिंता नहीं है; फिर आपकी आज्ञा पाकर मैं इस महायुद्ध में क्या नहीं कर सकता?॥5॥
 
‘Maharaj! For the sake of Arjuna I do not have to worry about the safety of my life in any way; then what cannot I do in this great war on receiving your orders?॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)