Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 7.111.1-2: संजय कहते हैं- राजन! धर्मराज का वह वचन प्रेमपूर्ण, हृदय को प्रिय, मधुर वचनों से युक्त, समयानुकूल, विचित्र, कहने योग्य और न्यायपूर्ण था। भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर शिनिप्रवर सात्यकि ने युधिष्ठिर को इस प्रकार उत्तर दिया-॥1-2॥ | mahabharat अध्याय 7.111: सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद । mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
संजय उवाच
प्रीतियुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च।
कालयुक्तं च चित्रं च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम्॥ १॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गव:।
सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम्॥ २॥
अनुवाद
संजय कहते हैं- राजन! धर्मराज का वह वचन प्रेमपूर्ण, हृदय को प्रिय, मधुर वचनों से युक्त, समयानुकूल, विचित्र, कहने योग्य और न्यायपूर्ण था। भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर शिनिप्रवर सात्यकि ने युधिष्ठिर को इस प्रकार उत्तर दिया-॥1-2॥
Sanjay says- Rajan! That word of Dharamraj was loving, dear to the heart, full of sweet words, timely, strange, worth saying and just. Bharatshrestha! Hearing this, Shinipravara Satyaki replied to Yudhishthira in this way -॥ 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥