श्लोक 1-2: संजय कहते हैं- राजन! धर्मराज का वह वचन प्रेमपूर्ण, हृदय को प्रिय, मधुर वचनों से युक्त, समयानुकूल, विचित्र, कहने योग्य और न्यायपूर्ण था। भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर शिनिप्रवर सात्यकि ने युधिष्ठिर को इस प्रकार उत्तर दिया-॥1-2॥
श्लोक 3: हे मर्यादा से कभी विचलित न होने वाले राजन! अर्जुन की सहायता के लिए आपने जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुना है। आपका कथन अद्भुत, न्यायपूर्ण और आपकी कीर्ति को बढ़ाने वाला है॥3॥
श्लोक 4: राजेन्द्र! ऐसे समय में मुझ जैसे प्रिय व्यक्ति को देखकर आपने जो कुछ कह सकते थे, वह कहा है। अर्जुन से जो कुछ कह सकते थे, वही आपने मुझसे भी कहा है॥ 4॥
श्लोक 5: ‘महाराज! अर्जुन के लिए मुझे अपने प्राणों की रक्षा की किसी भी प्रकार चिंता नहीं है; फिर आपकी आज्ञा पाकर मैं इस महायुद्ध में क्या नहीं कर सकता?॥5॥
श्लोक 6: राजन! यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं तीनों लोकों के देवताओं, दानवों और मनुष्यों से युद्ध कर सकता हूँ। फिर इस अत्यन्त दुर्बल कौरव सेना का यहाँ सामना करने में क्या बड़ी बात है?॥6॥
श्लोक 7: हे राजन! आज मैं युद्धभूमि में घूम-घूमकर दुर्योधन की सेना से युद्ध करूँगा और उन्हें परास्त करूँगा; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 8: हे राजन! मैं सकुशल अर्जुन के पास जाऊँगा और जयद्रथ के मारे जाने पर उसके साथ ही तुम्हारे पास लौट आऊँगा॥8॥
श्लोक 9: परन्तु हे मनुष्यों के स्वामी! युद्ध में जाने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण और बुद्धिमान अर्जुन ने जो कुछ मुझसे कहा था, वह सब आपको बताना मेरे लिए अत्यन्त आवश्यक है॥9॥
श्लोक 10: भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष बार-बार यह बात कहकर अर्जुन ने मुझे सम्पूर्ण सेना के मध्य में दृढ़तापूर्वक बांध लिया है।
श्लोक 11: उन्होंने कहा था, 'माधव! आज जब मैं जयद्रथ का वध करूँगा, तब तुम युद्ध में अपनी श्रेष्ठ बुद्धि का उपयोग करते हुए अत्यंत सावधानी से राजा युधिष्ठिर की रक्षा करना।' 11.
श्लोक 12: महाबाहो! मैं केवल आप पर अथवा महाबली प्रद्युम्न पर ही भरोसा कर सकता हूँ और राजा को उसके सुपुर्द करके बिना किसी संकोच के जयद्रथ के पास जा सकता हूँ॥12॥
श्लोक 13: माधव! तुम जानते हो कि द्रोण युद्धभूमि में कितने पराक्रमी हैं और श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा कितने सम्मानित हैं। तुम प्रतिदिन उनकी ली हुई प्रतिज्ञा के विषय में सुनते ही होंगे॥13॥
श्लोक 14: ‘द्रोणाचार्य भी धर्मराज को पकड़ना चाहते हैं और वे युद्धभूमि में राजा युधिष्ठिर को भी बन्दी बनाने में समर्थ हैं।॥14॥
श्लोक 15: ऐसी स्थिति में मैं श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर की रक्षा का सम्पूर्ण भार तुम पर छोड़ता हूँ और आज ही सिन्धुराज का वध करने जाऊँगा॥15॥
श्लोक 16: माधव! यदि द्रोणाचार्य युद्धभूमि में धर्मराज को बलपूर्वक न पकड़ सकें, तो मैं जयद्रथ को मारकर शीघ्र ही लौट आऊँगा॥ 16॥
श्लोक 17: मधुवंशी वीर! यदि द्रोणाचार्य पुरुषों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर को पकड़ लें, तो सिन्धुराज मारा नहीं जाएगा और मुझे भी बहुत दुःख होगा॥17॥
श्लोक 18: यदि सत्यवादी पाण्डुकुमार युधिष्ठिर को इस प्रकार बंदी बना लिया जाए तो हमें अवश्य ही पुनः वन में जाना पड़ेगा ॥18॥
श्लोक 19: यदि द्रोणाचार्य युद्धभूमि में कुपित होकर युधिष्ठिर को बन्दी बना लें, तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जाएगी॥19॥
श्लोक 20: महाबाहु माधव! अतः मुझे प्रसन्न करने, मुझे विजयी बनाने तथा मेरी कीर्ति बढ़ाने के लिए आज युद्धभूमि में राजा युधिष्ठिर की रक्षा कीजिए।'
श्लोक 21: भगवन्! इस प्रकार अर्जुन ने द्रोणाचार्य से निरन्तर भयभीत होकर आपको मेरे पास अमानत के रूप में रखा है।
श्लोक 22: महाबाहो! प्रभु! प्रतिदिन मुझे युद्धभूमि में रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न के अतिरिक्त कोई ऐसा योद्धा नहीं दिखाई देता जो द्रोणाचार्य के सामने खड़ा होकर उनसे युद्ध कर सके।
श्लोक 23-24h: अर्जुन भी मुझे बुद्धिमान द्रोणाचार्य का सामना करने के लिए योग्य योद्धा मानते हैं। हे राजन! मैं न तो अपने गुरु की इस संभावना को, न उनकी आज्ञा को टाल सकता हूँ और न ही आपको त्याग सकता हूँ॥23 1/2॥
श्लोक 24-25h: द्रोणाचार्य अभेद्य कवच से सुरक्षित हैं। अपनी तीव्र गति के कारण, वे युद्धभूमि में अपने प्रतिद्वन्द्वी के साथ ऐसे खेलते हैं जैसे कोई बालक पक्षी के साथ खेलता है।
श्लोक 25-26h: यदि कामदेव के अवतार श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न हाथ में धनुष लेकर यहाँ खड़े होते, तो मैं उन्हें तुम्हें सौंप देता। वे अर्जुन की भाँति तुम्हारी रक्षा कर सकते थे॥25 1/2॥
श्लोक 26-27h: ‘पहले तुम अपनी रक्षा का प्रबन्ध करो। मेरे जाने के बाद तुम्हारी रक्षा कौन करेगा, जब तक मैं अर्जुन के पास न जाऊँ (और लौट न आऊँ) तब तक युद्धभूमि में द्रोणाचार्य से कौन युद्ध करता रहेगा?॥26 1/2॥
श्लोक 27-28h: महाराज! आज आपको अर्जुन के लिए कोई भय नहीं होना चाहिए। वह महाबाहु किसी भी कार्य को करने के बाद कभी शिथिल नहीं होता।'
श्लोक 28-30h: हे राजन! सिंधु और पुरु देश के योद्धा, उत्तर और दक्षिण के निवासी तथा अन्य महारथी तथा कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी भी क्रुद्ध अर्जुन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हैं।
श्लोक 30-31: नरेश्वर! यदि देवता, दानव, मनुष्य, राक्षस, किन्नर और महासर्प तथा समस्त चर-अचर जीव-जंतु भी युद्ध के लिए तैयार हो जाएँ, तो भी वे सब मिलकर भी युद्धस्थल में अर्जुन का सामना नहीं कर सकते ॥30-31॥
श्लोक 32-33h: महाराज! यह जानकर अर्जुन के विषय में आपका भय दूर हो जाना चाहिए। जहाँ वीर एवं महान धनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुन उपस्थित हों, वहाँ कार्य में कोई बाधा नहीं आ सकती। 3 1/2॥
श्लोक 33-34h: ‘अपने भाई अर्जुन में जो दिव्य शक्तियाँ, अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुणता, योग, युद्धभूमि में क्रोध, कृतज्ञता और दया आदि गुण हैं, उनका तुम्हें बार-बार चिन्तन करना चाहिए।॥33 1/2॥
श्लोक 34-35h: हे राजन! मैं आपका सहायक रहा हूँ। यदि मैं भी अर्जुन के पास जाऊँ, तो कृपया युद्ध में द्रोणाचार्य द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले विचित्र अस्त्रों के विषय में भली-भाँति विचार कर लेना।
श्लोक 35-36h: भरतवंश के राजा! द्रोणाचार्य आपको पकड़ने की तीव्र इच्छा रखते हैं। वे अपने वचन की रक्षा करना चाहते हैं और उसे सत्य सिद्ध करना चाहते हैं। 35 1/2
श्लोक 36-37h: अब तुम अपनी सुरक्षा का प्रबंध स्वयं करो। पार्थ! मेरे जाने के बाद तुम्हारी रक्षा कौन करेगा? मैं किस पर भरोसा करके अर्जुन के पास जा सकती हूँ।
श्लोक 37-38h: महाराज! हे कुरुपुत्र! इस महायुद्ध में मैं आपको किसी वीर पुरुष के संरक्षण में रखे बिना कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।'
श्लोक 38-39: हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजन! इस विषय पर अपनी बुद्धि से गहन विचार करके जो भी कार्य आपको सर्वाधिक शुभ लगे, उसके लिए मुझे आज्ञा दीजिए।॥38-39॥
श्लोक 40: युधिष्ठिर ने कहा- हे महाबाहु माधव! आपकी बात ठीक है। आर्य! श्वेत वाहन द्रोणाचार्य के कारण मेरा हृदय पवित्र (शांत) नहीं हो रहा है।
श्लोक 41: मैं अपनी रक्षा के लिए महान प्रयत्न करूँगा। तुम मेरी आज्ञा से उस स्थान पर जाओ जहाँ अर्जुन गया है।
श्लोक 42: युद्ध में मुझे अपनी रक्षा करनी चाहिए या तुम्हें अर्जुन के पास भेजना चाहिए? इन दोनों बातों पर तुम्हें अपने मन से विचार करना चाहिए और फिर निर्णय करना चाहिए कि वहाँ जाना है या नहीं।
श्लोक 43: अतः जहाँ अर्जुन गया है, वहाँ जाने के लिए तुम तैयार हो जाओ। महाबली भीमसेन भी मेरी रक्षा करेंगे ॥ 43॥
श्लोक 44: हे पिता! धृष्टद्युम्न अपने भाइयों, पराक्रमी राजाओं और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों सहित मेरी रक्षा करेंगे; इसमें कोई संदेह नहीं है॥44॥
श्लोक 45-47h: तात! पाँचों भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, विराट, द्रुपद, महारथी शिखण्डी, धृष्टकेतु, बलशाली मामा कुन्तिभोज (पुरुजित), नकुल, सहदेव, पांचाल और सृंजय-वेरोगंस - ये सभी सतर्क रहेंगे और निःसंदेह मेरी रक्षा करेंगे। 45-46 1/2॥
श्लोक 47-48h: द्रोणाचार्य और कृतवर्मा अपनी सेना सहित युद्धभूमि में मुझ तक नहीं पहुँच सकेंगे और न ही मुझे परास्त कर सकेंगे ॥47 1/2॥
श्लोक 48-49h: शत्रुओं को पीड़ा देने वाले धृष्टद्युम्न अपने पराक्रम से युद्धस्थल में क्रोधित द्रोणाचार्य को उसी प्रकार रोक देंगे, जैसे तट की भूमि समुद्र को आगे बढ़ने से रोक देती है।
श्लोक 49-50h: जहाँ शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाला द्रुपदपुत्र युद्धभूमि में खड़ा होगा, वहाँ द्रोणाचार्य मेरी शक्तिशाली सेना पर किसी भी प्रकार से आक्रमण नहीं कर सकेंगे।
श्लोक 50-51h: यह धृष्टद्युम्न अग्नि से कवच, धनुष, बाण, तलवार और उत्तम आभूषणों सहित द्रोणाचार्य का नाश करने के लिए प्रकट हुआ है।
श्लोक 51: अतः हे शिनिनपुत्र! तुम निश्चिंत होकर जाओ। मुझ पर कोई संदेह मत करो। धृष्टद्युम्न युद्धभूमि में क्रुद्ध द्रोणाचार्य को पूर्णतया रोक देगा। 51.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥