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mahabharat 7.110.85: आज मैं किसी भी प्रकार युद्ध में मन नहीं लगा पा रहा हूँ। इधर द्रोणाचार्य भी युद्धभूमि पर बड़े जोर से आक्रमण कर रहे हैं और मेरी सेना को कष्ट दे रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  7.110.85 
न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन।
द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
आज मैं किसी भी प्रकार युद्ध में मन नहीं लगा पा रहा हूँ। इधर द्रोणाचार्य भी युद्धभूमि पर बड़े जोर से आक्रमण कर रहे हैं और मेरी सेना को कष्ट दे रहे हैं।
 
Today I am not able to concentrate on the battle in any way. Here Dronacharya is also attacking the battlefield with great force and troubling my army. 85.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)