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mahabharat 7.110.52: सत्यके ! एक तो मित्रों को सुरक्षा देने वाले भगवान श्रीकृष्ण हमारे लिए युद्ध में प्राण त्यागने को सदैव तत्पर रहते हैं और दूसरे आप ॥52॥   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  7.110.52 
एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयङ्कर:।
रणे संत्यजति प्राणान् द्वितीयस्त्वं च सात्यके॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
सत्यके ! एक तो मित्रों को सुरक्षा देने वाले भगवान श्रीकृष्ण हमारे लिए युद्ध में प्राण त्यागने को सदैव तत्पर रहते हैं और दूसरे आप ॥52॥
 
Satyake! Firstly Lord Krishna, who gives protection to friends, is always ready to sacrifice his life in war for us and secondly you. ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)