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mahabharat 7.110.43: हे महात्मन् सत्यके! इस दृष्टि से विचार करने पर मुझे समस्त योद्धाओं में आपसे बढ़कर कोई मित्र नहीं दिखाई देता॥43॥   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  7.110.43 
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयन् शिनिपुङ्गव।
त्वत्त: सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन् सत्यके! इस दृष्टि से विचार करने पर मुझे समस्त योद्धाओं में आपसे बढ़कर कोई मित्र नहीं दिखाई देता॥43॥
 
O great Satyake! Thinking from this point of view, I do not find anyone among all the warriors who is a better friend than you. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)