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mahabharat 7.110.42: युधिष्ठिर बोले - हे शैनय्य! पूर्वकाल में ऋषियों ने विपत्ति के समय मित्र के कर्तव्य के विषय में सनातन धर्म का ज्ञान कराया था, आज उसी का पालन करने का अवसर आया है ॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  7.110.42 
युधिष्ठिर उवाच
य: स धर्म: पुरा दृष्ट: सद्भि: शैनेय शाश्वत:।
साम्पराये सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽयमागत:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - हे शैनय्य! पूर्वकाल में ऋषियों ने विपत्ति के समय मित्र के कर्तव्य के विषय में सनातन धर्म का ज्ञान कराया था, आज उसी का पालन करने का अवसर आया है ॥ 42॥
 
Yudhishthira said - O Shainayya! In the past, the sages had realized the eternal Dharma regarding the duty of a friend at the time of adversity; today the opportunity has come to follow the same. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)