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mahabharat 7.110.39-40h: तब मोहवश पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर इस प्रकार चिन्तित होने लगे कि, 'जिस प्रकार पांचजन्य शंख बज रहा है और जिस प्रकार कौरव सैनिक बार-बार हर्ष से जयजयकार कर रहे हैं, उससे प्रतीत होता है कि अर्जुन अवश्य ही अस्वस्थ हैं।'   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 39-40h
 
 
श्लोक  7.110.39-40h 
कश्मलाभिहतो राजा चिन्तयामास पाण्डव:।
न नूनं स्वस्ति पार्थाय यथा नदति शङ्खराट्॥ ३९॥
कौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहु:।
 
 
अनुवाद
तब मोहवश पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर इस प्रकार चिन्तित होने लगे कि, 'जिस प्रकार पांचजन्य शंख बज रहा है और जिस प्रकार कौरव सैनिक बार-बार हर्ष से जयजयकार कर रहे हैं, उससे प्रतीत होता है कि अर्जुन अवश्य ही अस्वस्थ हैं।'
 
Then King Yudhishthira, son of Pandu, overcome by delusion, began to worry thus: 'The way the conch-king Panchajanya is sounding and the way the Kaurava soldiers are repeatedly shouting for joy, it appears that certainly, Arjuna is not well.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)