Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.110.33: जिस प्रकार दावानल से घिरे हुए घने जंगल में वन-पशुओं का विलाप सुनाई देता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य के बाणों से घायल हुए शत्रु योद्धाओं की चीखें भी वहां सुनाई देती थीं।   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  7.110.33 
तेषां समभवच्छब्दो विद्धानां द्रोणसायकै:।
वनौकसामिवारण्ये व्याप्तानां धूम्रकेतुना॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार दावानल से घिरे हुए घने जंगल में वन-पशुओं का विलाप सुनाई देता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य के बाणों से घायल हुए शत्रु योद्धाओं की चीखें भी वहां सुनाई देती थीं।
 
Just as the wailings of forest animals can be heard in a dense forest engulfed by a forest fire, similarly the cries of the enemy warriors, wounded by Dronacharya's arrows, could be heard there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)