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mahabharat 7.110.25: प्रभु ! जैसे दोपहर के समय प्रज्वलित सूर्य को देखना कठिन होता है, वैसे ही वे सभी योद्धा भारद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य को भी नहीं देख पा रहे थे ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 7.110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 110: द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव-सेनामें प्रवेश करनेका आदेश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.110.25 
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकु: प्रतिवीक्षितुम्।
मध्यंदिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो॥ २५॥
 
 
अनुवाद
प्रभु ! जैसे दोपहर के समय प्रज्वलित सूर्य को देखना कठिन होता है, वैसे ही वे सभी योद्धा भारद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य को भी नहीं देख पा रहे थे ॥25॥
 
Lord! Just as it is difficult to look at the blazing sun at noon, similarly all those warriors were not even able to look at Bharadvajan's son Dronacharya. ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)