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श्लोक 7.107.39  |
ततो द्रोणो भृशं क्रुद्ध: सहसोद्वृत्य चक्षुषी।
सात्यकिं सत्यकर्माणं स्वयमेवाभिदुद्रुवे॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| तब द्रोणाचार्य ने अत्यन्त क्रोध में भरकर अचानक अपनी दृष्टि घुमाई और सत्यवादी सात्यकि पर ही आक्रमण कर दिया। |
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| Then Dronacharya, filled with great anger, suddenly turned his eyes and attacked the truthful Satyaki himself. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे सप्ताधिकशततमोऽध्याय:॥ १०७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥
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