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mahabharat 7.105.21-22h: जैसे प्राचीन काल में देवताओं और दानवों के युद्ध में पूषा रत्न शोभायमान था, उसी प्रकार वह चाँदी का ध्वज जयद्रथ की शोभा बढ़ा रहा था।   |   mahabharat अध्याय 7.105: अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.105.21-22h 
शुशुभे केतुना तेन राजतेन जयद्रथ:॥ २१॥
यथा देवासुरे युद्धे पुरा पूषा स्म शोभते।
 
 
अनुवाद
जैसे प्राचीन काल में देवताओं और दानवों के युद्ध में पूषा रत्न शोभायमान था, उसी प्रकार वह चाँदी का ध्वज जयद्रथ की शोभा बढ़ा रहा था।
 
Just as Pusha looked beautiful in the war between gods and demons in ancient times, in the same way that silver flag was adorning Jayadratha. 21/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)