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mahabharat 7.100.5: जब रथियों के समूह और बहुत से हाथी-घोड़ों ने चारों ओर से उन पर आक्रमण किया, तब भी कुंतीपुत्र अर्जुन तनिक भी नहीं घबराए। उनका धैर्य और साहस सभी पुरुषों से बढ़कर था।   |   mahabharat अध्याय 7.100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.100.5 
आपतत्सु रथौघेषु प्रभूतगजवाजिषु।
नासम्भ्रमत् तदा पार्थस्तदस्य पुरुषानति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब रथियों के समूह और बहुत से हाथी-घोड़ों ने चारों ओर से उन पर आक्रमण किया, तब भी कुंतीपुत्र अर्जुन तनिक भी नहीं घबराए। उनका धैर्य और साहस सभी पुरुषों से बढ़कर था।
 
Even when groups of charioteers and many elephants and horses attacked them from all sides, Kunti's son Arjun did not panic at all. His patience and courage were greater than that of all men. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)