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mahabharat 7.100.37: उस समय सर्वत्र इतनी धूल उड़ रही थी कि सूर्यदेव छिप गए। उस युद्धस्थल में बाणों से पीड़ित सैनिक श्रीकृष्ण और अर्जुन की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते थे।   |   mahabharat अध्याय 7.100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  7.100.37 
दिवाकरेऽथ रजसा सर्वत: संवृते भृशम्।
शरार्ताश्च रणे योधा: शेकु: कृष्णौ न वीक्षितुम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उस समय सर्वत्र इतनी धूल उड़ रही थी कि सूर्यदेव छिप गए। उस युद्धस्थल में बाणों से पीड़ित सैनिक श्रीकृष्ण और अर्जुन की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते थे।
 
At that time so much dust was flying everywhere that the Sun God hid himself. In that battle field, the soldiers who were suffering from the arrows could not even lift their eyes to look at Shri Krishna and Arjun. 37.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सैन्यविस्मये शततमोऽध्याय:॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सेनाविस्मयविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १००॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)