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mahabharat 7.100.19: महाराज! वे टूटे हुए दाँतों वाले सर्पों के समान गहरी साँस लेते हुए एक-एक करके कहने लगे, 'हाय! हमें धिक्कार है, हमें धिक्कार है, अर्जुन और श्रीकृष्ण चले गये।'   |   mahabharat अध्याय 7.100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  7.100.19 
विनि:श्वसन्तस्ते राजन् भग्नदंष्ट्रा इवोरगा:।
धिगहो धिग्गत: पार्थ: कृष्णश्चेत्यब्रुवन् पृथक्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वे टूटे हुए दाँतों वाले सर्पों के समान गहरी साँस लेते हुए एक-एक करके कहने लगे, 'हाय! हमें धिक्कार है, हमें धिक्कार है, अर्जुन और श्रीकृष्ण चले गये।'
 
King! Like serpents with broken teeth, drawing in deep breaths, they began to say one after the other, 'Oh! Shame on us, shame on us, Arjun and Shri Krishna are gone.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)