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mahabharat 7.100.1-2: संजय कहते हैं - हे राजन! जब कुन्तीपुत्र महाबली ने उस जल को उत्पन्न करके शत्रु सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया और बाणों का घर बना दिया, तब महाबली भगवान श्रीकृष्ण ने तुरन्त ही रथ से उतरकर कंकपत्रयुक्त बाणों से घायल हुए घोड़ों को मुक्त कर दिया। ॥1-2॥   |   mahabharat अध्याय 7.100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 100: श्रीकृष्णके द्वारा अश्वपरिचर्या तथा खा-पीकर हृष्ट-पुष्ट हुए अश्वोंद्वारा अर्जुनका पुन: शत्रुसेनापर आक्रमण करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़ना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  7.100.1-2 
संजय उवाच
सलिले जनिते तस्मिन् कौन्तेयेन महात्मना।
निस्तारिते द्विषत्सैन्ये कृते च शरवेश्मनि॥ १॥
वासुदेवो रथात् तूर्णमवतीर्य महाद्युति:।
मोचयामास तुरगान् विनुन्नान् कङ्कपत्रिभि:॥ २॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - हे राजन! जब कुन्तीपुत्र महाबली ने उस जल को उत्पन्न करके शत्रु सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया और बाणों का घर बना दिया, तब महाबली भगवान श्रीकृष्ण ने तुरन्त ही रथ से उतरकर कंकपत्रयुक्त बाणों से घायल हुए घोड़ों को मुक्त कर दिया। ॥1-2॥
 
Sanjaya says - O King! When the great son of Kunti had produced that water, stopped the enemy army from advancing and created a house of arrows, then the mighty Lord Krishna immediately got down from the chariot and freed the horses that were injured by the arrows bearing Kanka leaves. ॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)