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श्लोक 7.1.53  |
आर्तानां बान्धवानां च क्रन्दतां च विशेषत:।
परित्यज्य रणे प्राणांस्तत्त्राणार्थं च शर्म च।
कृतवान् मम पुत्राणां जयाशां सफलामपि॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| क्या उन्होंने युद्धस्थल में विशेष रूप से शोक से रोते हुए अपने भाइयों की रक्षा और कल्याण के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर मेरे पुत्रों की विजय की इच्छा पूरी की थी ? 53॥ |
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| Did he fulfill my sons' desire for victory by sacrificing his life for the protection and welfare of his brothers who were especially crying in grief on the battlefield? 53॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्र-प्रश्नविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
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