श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 1: भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  7.1.50 
अपि तन्न मृषाकार्षीत् कच्चित् सत्यपराक्रम:।
सम्भ्रान्तानां तदार्तानां त्रस्तानां त्राणमिच्छताम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
क्या कभी ऐसा हुआ है कि संकट के समय भयभीत और डरे हुए कौरवों की रक्षा की प्रार्थना वीर कर्ण द्वारा निष्फल कर दी गई हो?
 
Has it ever happened that the Kauravas' prayers, frightened and scared in a crisis, seeking protection, were rendered futile by the valiant Karna?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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