श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 1: भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  7.1.37 
रथातिरथसंख्यायां योऽग्रणी: शूरसम्मत:।
सासुरानपि देवेशान् रणे यो योद्‍धुमुत्सहेत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वह रथियों और सारथिओं में श्रेष्ठ है और वीर योद्धा होने के गौरव का पात्र है। वह रणभूमि में दैत्यों सहित समस्त देवी-देवताओं से युद्ध करने में उत्साही है। ॥37॥
 
He is foremost among charioteers and charioteers and is worthy of the honour of being a brave warrior. He is enthusiastic about fighting with all the gods and goddesses along with the demons in the battlefield. ॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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