श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 1: भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  7.1.25-26 
पतिते भरतश्रेष्ठे बभूव कुरुवाहिनी।
द्यौरिवापेतनक्षत्रा हीनं खमिव वायुना॥ २५॥
विपन्नसस्येव मही वाक् चैवासंस्कृता तथा।
आसुरीव यथा सेना निगृहीते नृपे बलौ॥ २६॥
 
 
अनुवाद
भरत के मुकुटमणि भीष्म के गिर जाने पर कौरव सेना उसी प्रकार व्याकुल, असहाय और दरिद्र हो गई, जैसे आकाश के तारागण से रहित, अन्तरिक्ष में वायु से रहित, कृषि भूमि के नष्ट हो जाने से, वाणी के असंस्कृत हो जाने से और राजा बलि के बंदी हो जाने से सेनापति विहीन राक्षस सेना हो गई हो ॥25-26॥
 
After the fall of Bharat's crown jewel Bhishma, the Kaurava army became anxious, helpless and destitute, like the demon army which was bereft of a leader after the sky was devoid of stars, the space was devoid of air, the agricultural land was destroyed, speech was uncultured and King Bali was captured. ॥25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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