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mahabharat 7.1.1-2: जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! यह सुनकर कि अतुलित सत्व, ओज, बल और पराक्रम से संपन्न देवव्रत भीष्म पांचाल नरेश शिखंडी के हाथों मारे गए, राजा धृतराष्ट्र के नेत्र शोक से भर गए होंगे। ब्रह्मर्षे! अपने ज्येष्ठ पिता के मारे जाने पर महाबली धृतराष्ट्र ने क्या प्रयत्न किए? 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 7.1: भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 1: भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  7.1.1-2 
जनमेजय उवाच
तमप्रतिमसत्त्वौजोबलवीर्यसमन्वितम्।
हतं देवव्रतं श्रुत्वा पाञ्चाल्येन शिखण्डिना॥ १॥
धृतराष्ट्रस्ततो राजा शोकव्याकुललोचन:।
किमचेष्टत विप्रर्षे हते पितरि वीर्यवान्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! यह सुनकर कि अतुलित सत्व, ओज, बल और पराक्रम से संपन्न देवव्रत भीष्म पांचाल नरेश शिखंडी के हाथों मारे गए, राजा धृतराष्ट्र के नेत्र शोक से भर गए होंगे। ब्रह्मर्षे! अपने ज्येष्ठ पिता के मारे जाने पर महाबली धृतराष्ट्र ने क्या प्रयत्न किए? 1-2॥
 
Janamejaya asked – Brahmin! King Dhritarashtra's eyes must have been filled with grief after hearing that Devavrata Bhishma, who was blessed with incomparable satva, vigor, strength and valor, was killed by the hands of Panchala king Shikhandi. Brahmarshe! What efforts did the mighty Dhritarashtra make after his eldest father was killed? 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)