श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 99: नवें दिनके युद्धके लिये उभयपक्षकी सेनाओंकी व्यूह-रचना और उनके घमासान युद्धका आरम्भ तथा विनाशसूचक उत्पातोंका वर्णन  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  6.99.29-30 
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रये
ततस्तयो: पाण्डवधार्तराष्ट्रयो:।
चकम्पिरे शङ्खमृदङ्गनि:स्वनै:
प्रकम्पितानीव वनानि वायुना॥ २९॥
नरेन्द्रनागाश्वसमाकुलाना-
मभ्यायतीनामशिवे मुहूर्ते।
बभूव घोषस्तुमुलश्चमूनां
वातोद्‍धुतानामिव सागराणाम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
उस महासमर में पाण्डव और कौरव पक्ष की विशाल सेनाएँ शंख और नगाड़ों की ध्वनि से ऐसे काँप रही थीं, जैसे वायु के वेग से सारा वन-प्रदेश काँपने लगता है। उस अशुभ घड़ी में राजाओं, हाथियों और घोड़ों से युक्त उन विशाल सेनाओं का एक-दूसरे पर आक्रमण करने का भयंकर शब्द, वायु से उद्वेलित समुद्रों के गर्जन के समान प्रतीत हो रहा था।
 
In that great battle the huge armies of the Pandava and the Kaurava sides were trembling with the sounds of conches and drums, just as the whole forest region starts shaking with the force of the wind. In that ominous moment the terrifying noise of those huge armies of both sides, replete with kings, elephants and horses, attacking each other, seemed like the roar of the oceans agitated by the wind.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि परस्परव्यूहरचनायामुत्पातदर्शने एकोनशततमोऽध्याय:॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें परस्पर व्यूह-रचनाके पश्चात् उत्पातदर्शनविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)