ततो दुर्योधनो राजा पुनर्भ्रातरमब्रवीत्।
सव्यं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम्॥ ४७॥
गोप्तारावर्जुनस्यैतावर्जुनोऽपि शिखण्डिन:।
रक्ष्यमाण: स पार्थेन तथास्माभिर्विवर्जित:॥ ४८॥
यथा भीष्मं न नो हन्याद् दु:शासन तथा कुरु।
अनुवाद
तब राजा दुर्योधन ने अपने भाई से पुनः इस प्रकार कहा - 'दुःशासन! अर्जुन के रथ का बायाँ पहिया युधामन्यु द्वारा तथा दायाँ पहिया उत्तमौजा द्वारा सुरक्षित है। इस प्रकार ये अर्जुन के दो रक्षक हैं और अर्जुन शिखण्डी की भी रक्षा करता है। ऐसी व्यवस्था करो कि शिखण्डी अर्जुन से सुरक्षित तथा हमसे उपेक्षित होकर हमारे भीष्म को न मार सके। 47-48 1/2॥
Then King Duryodhana again said to his brother thus - 'Dushasan! The left wheel of Arjuna's chariot is protected by Yudhamanyu and the right wheel is protected by Uttamauja. Thus, these are two protectors of Arjun and Arjun also protects Shikhandi. Make such arrangements that Shikhandi cannot kill our Bhishma, being safe from Arjun and neglected by us. 47-48 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥