संजय उवाच
ततो दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबल:।
दु:शासनश्च पुत्रस्ते सूतपुत्रश्च दुर्जय:॥ १॥
समागम्य महाराज मन्त्रं चक्रुर्विवक्षितम्।
कथं पाण्डुसुता: संख्ये जेतव्या: सगणा इति॥ २॥
अनुवाद
संजय कहते हैं- महाराज! तत्पश्चात राजा दुर्योधन, सुबलपुत्र शकुनि, आपके पुत्र दु:शासन, दुर्जयपुत्र कर्ण- ये सब मिलकर अभीष्ट कार्य के विषय में गुप्त रूप से मंत्रणा करने लगे। उनकी मंत्रणा का मुख्य विषय यह था कि पाण्डवों को उनके दल और बल सहित युद्ध में किस प्रकार पराजित किया जा सकता है? 1-2॥
Sanjay says- Maharaj! Thereafter, King Duryodhana, Subala's son Shakuni, your son Dushasan, Durjay's son Karna - all of them together started consulting secretly regarding the desired work. The main topic of his advice was that how can the Pandavas be defeated in the war with their team and strength? 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥