श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 95: दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध  »  श्लोक d1h-3h
 
 
श्लोक  6.95.d1h-3h 
संजय उवाच
तस्मिन् महति संक्रन्दे राजा दुर्योधनस्तदा।
(पराजयं राक्षसेन नामृष्यत परंतप:।)
गाङ्गेयमुपसंगम्य विनयेनाभिवाद्य च॥ १॥
तस्य सर्वं यथावृत्तमाख्यातुमुपचक्रमे।
घटोत्कचस्य विजयमात्मनश्च पराजयम्॥ २॥
कथयामास दुर्धर्षो विनि:श्वस्य पुन: पुन:।
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं- महाराज! शत्रुओं को संताप देने वाला राजा दुर्योधन उस महायुद्ध में राक्षस के हाथों अपनी पराजय सहन न कर सका। वह गंगानन्दन भीष्मजी के पास गया और उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम करके सारा वृत्तांत यथावत् सुनाया। उस वीर योद्धा ने बार-बार गहरी साँस लेकर घटोत्कच की विजय और अपनी पराजय का वृत्तांत सुनाया। 1-2 1/2॥
 
Sanjay says- Maharaj! King Duryodhana, who tormented his enemies, could not bear his defeat at the hands of a demon in that great war. He went to Ganganandan Bhishmaji and after politely saluting him, narrated the entire story exactly. That brave warrior repeatedly took a deep breath and told the story of Ghatotkacha's victory and his defeat. 1-2 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)