स विस्फुलिङ्गमालाभि: समन्तात् परिवेष्टित:॥ ६०॥
तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा प्राग्ज्योतिषो नृप:।
चिक्षेप रुचिरं तीक्ष्णमर्धचन्द्रं सुदारुणम्॥ ६१॥
अनुवाद
वह त्रिशूल अग्नि की चिनगारियों के समूह से सब ओर से घिरा हुआ था। उसे सहसा अपनी ओर आता देख प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भगदत्त ने एक अत्यन्त सुन्दर, तीक्ष्ण तथा मनोहर अर्द्धचन्द्राकार बाण चलाया। 60-61॥
That trident was surrounded on all sides by a group of sparks of fire. Seeing him suddenly coming towards him, King Bhagdatta of Pragjyotishpur shot a very beautiful and very sharp and beautiful crescent-shaped arrow. 60-61॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥