श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 95: दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.95.33 
कुञ्जरेण प्रभिन्नेन सप्तधा स्रवता मदम्।
पर्वतेन यथा तोयं स्रवमाणेन सर्वश:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जिस हाथी पर वह सवार था, उसके माथे से सात मदिरा की धाराएँ निकल रही थीं। वह पर्वत के समान प्रतीत हो रहा था, जिसके चारों ओर से जल के झरने फूट रहे थे॥33॥
 
Seven streams of wine were gushing out from the forehead of the elephant on which he was riding. It looked like a mountain with waterfalls of water gushing out from all sides. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)